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सरसों
कृषि ज्ञान
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सरसों की खेती कैसे करें?

सरसों की खेती भारतीय कृषि के महत्वपूर्ण हिस्से में से एक है, और इसकी खेती किसानों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी साबित हो सकती है। ये रबी मौसम की फसल है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, असम एवं पंजाब कुछ प्रमुख सरसों उत्पादक राज्यों में शामिल हैं।

  1. भूमि का चयन: सरसों की खेती के लिए सही भूमि का चयन करना महत्वपूर्ण है। इसकी खेती रेतीली मिट्टी से लेकर भारी मटियार मिट्टी में भी की जा सकती है। मिट्टी का पीएच स्तर 6.5 से 7.0 के बीच होना चाहिए।
  2. बीज उपचार: बेहतर उपज के लिए रोग रहित बीज का चयन करें। बुवाई से पहले प्रति किलोग्राम बीज को 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम या 2 ग्राम थीरम से उपचारित करें। इसके साथ ही अपने क्षेत्र के अनुसार इसकी किस्मों का चयन करें। सरसों की बेहतर पैदावार के लिए आप 'देहात' की कुछ बेहतरीन किस्मों का चयन कर सकते हैं। जिसमें 'देहात डीएमएस गोल्ड', 'देहात डीएमएस डायमंड' और 'देहात डीएमएस बी9' शामिल है।
  3. खेत की तैयारी: सरसों के दाने छोटे होते हैं इसलिए इसकी खेती के लिए मिट्टी का भुरभुरा होना आवश्यक है। यदि खेत की मिट्टी सूखी है तो नमी को बरकरार रखने के लिए पलेवा करें। आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ खेत में 4 से 5 टन सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं। गोबर की खाद की जगह कम्पोस्ट खाद का भी प्रयोग कर सकते हैं।
  4. बीज की मात्रा एवं बुवाई: सरसों की बुवाई के लिए अक्टूबर से नवंबर का महीना उपयुक्त है। कुछ क्षेत्रों में दिसंबर महीने में भी इसकी बुवाई की जा सकती है। ज्यादातर क्षेत्रों में इसकी बुवाई छिड़काव विधि से की जाती है। लेकिन बेहतर उपज प्राप्त करने के कतारों में इसकी बुवाई करें। सभी कतारों के बीच 13 से 15 इंच की दूरी रखें। पौधों से पौधों के बीच 4 से 5 इंच की दूरी होनी चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में खेती के लिए प्रति एकड़ भूमि में 2 से 2.4 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।
  5. सिंचाई प्रबंधन: सरसों की फसल को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 2 से 3 सिंचाई पर्याप्त है। बुवाई के तुरंत बाद खेत में पहली सिंचाई करनी चाहिए। इससे बीज के अंकुरण में आसानी होती है। बुवाई के करीब 25 से 30 दिनों बाद जब पौधों में शाखाएं निकलने लगती हैं तब दूसरी सिंचाई करनी चाहिए। पौधों में फूल निकलने के समय तीसरी सिंचाई करें।फलियां बनते समय यानि बीज की बुवाई के 70 से 80 दिनों बाद सिंचाई करें।
  6. खरपतवार नियंत्रण: खरपतवारों को पनपने से रोकने के लिए बुवाई के 3 दिनों के अंदर प्रति एकड़ खेत में 400 ग्राम पेंडीमेथालिन का छिड़काव करें। खरपतवारों पर नियंत्रण के लिए कुछ समय के अंतराल पर निराई-गुड़ाई करते रहें।
  7. रोग एवं कीट प्रबंधन: सरसों की फसल में माहू, कटवर्म कीट, आरा मक्खी, सफेद जंग, तना गलन, जैसे कीटों एवं रोगों का प्रकोप अधिक होता है। इनसे प्रभावित पौधों में फूल-फलियां कम आती हैं। कई बार पौधे सूखने लगते हैं। ऐसे में सरसों की उपज में कमी आती है। इस समस्या से बचने के लिए कुछ समय के अंतराल पर खेत में निरिक्षण करते रहें। किसी भी रोग आया कीट के लक्षण नजर आने पर उचित दवाओं का प्रयोग करें।
  8. फसल की कटाई: सरसों की कटाई फरवरी से मार्च महीने में कर लेनी चाहिए। कटाई में देर होने पर फलियां फटने लगती हैं और दानों का वजन एवं दानों में तेल की मात्रा कम होने की संभावना बनी रहती है। सरसों की 75 प्रतिशत फलियां जब पीली हो जाएं तब फसलों की कटाई करें। कटाई के बाद फसल को कुछ दिनों तक धूप में रख कर सूखाएं। जब दानों में 15 से 20 प्रतिशत तक नमी रहे तब इसकी गहाई करें।

सरसों की खेती में आपको किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है? अपने जवाब हमें कमेंट के माध्यम से बताएं। कृषि संबंधी जानकारियों के लिए देहात के टोल फ्री नंबर 1800-1036-110 पर सम्पर्क करके विशेषज्ञों से परामर्श भी कर सकते हैं। इसके साथ ही इस पोस्ट को लाइक एवं कमेंट करना न भूलें।

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