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1 Apr
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बैंगन की खेती: बेहतरीन किस्में, खेत की तैयारी और उर्वरक प्रबंधन | Efficient Cultivation of Brinjal: Varieties, Land Preparation, Fertilizer Usage

कुछ पर्वतीय क्षेत्रों को छोड़ कर भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में बैंगन की खेती की जाती है। सब्जियों में इसकी मांग अधिक होने के कारण इसकी खेती से किसानों को अच्छा मुनाफा होता है। अगर आप भी बैंगन की खेती करने का मन बना रहे हैं तो इस पोस्ट के माध्यम से खेती से पहले इससे जुड़ी कुछ बारीकियों को जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

बैंगन की खेती कैसे करें? | How to Cultivate Brinjal?

  • उपयुक्त जलवायु: बैंगन की खेती गर्मी, ठंड एवं वर्षा सभी मौसम में की जाती है। बैंगन की खेती के लिए गर्म जलवायु सबसे उपयुक्त है। इसके पौधे पाला एवं अत्यधिक ठंड को सहन नहीं कर सकते हैं।
  • भूमि का चयन: इसकी खेती अलग-अलग किस्म की मिट्टी में की जा सकती है। लेकिन इसकी बेहतर पैदावार के लिए अच्छी जल निकासी युक्त उपजाऊ रेतीली दोमट मिट्टी उपयुक्त है। मिट्टी का पीएच स्तर 5.5 से 6.6 होना चाहिए।
  • बुवाई का समय: ठंड के मौसम की फसल के लिए जुलाई-अगस्त महीने में बुवाई करें। गर्मी की फसल के लिए जनवरी-फरवरी महीने में बुवाई करें। वहीं वर्षा की फसल के लिए अप्रैल महीने में बुवाई करें।
  • बीज की मात्रा एवं बीज उपचार: बीज की मात्रा किस्मों पर निर्भर करती है। सामान्यतः प्रति एकड़ खेत के लिए 80-100 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बुवाई से पहले प्रति किलोग्राम बीज को 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम 50% डब्ल्यूपी (धानुका धानुस्टिन, डाउ बेंगार्ड, क्रिस्टल बाविस्टिन) से उपचारित करें।
  • बेहतरीन किस्में: बैंगन की खेती के लिए सही बीज का चयन करना महत्वपूर्ण है। उच्च उत्पादन और अच्छी गुणवत्ता की फसल प्राप्त करने के लिए विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए हाइब्रिड बीजों का चयन करें। 'देहात डीएचएस 4119' किस्म की बैंगन की बुवाई कर के आप इसकी बेहतर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा आप वीएनआर 212, वीएनआर पूनम, आइरिस विनायक F1 बैंगन, शाइन ब्रांड हाइब्रिड ओपल F1 बैंगन, सर्पन एफ1 हाईब्रिड बैंगन, आदि किस्मों का भी चयन कर सकते हैं।
  • खेत की तैयारी: खेत तैयार करते समय सबसे पहले 4 से 5 बार अच्छी तरह जुताई करें। जुताई के बाद खेत को समतल बना लें। नर्सरी में तैयार किए गए पौधों की रोपाई के लिए खेत में जमीं की सतह से करीब 6 इंच ऊंची मेड़ें तैयार करें। खेत में जल जमाव की स्थिति उत्पन्न न होने दें। खेत में जल जमाव होने पर फफूंद जनित रोगों के होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए जल निकासी की उचित व्यवस्था करें। आप चाहें तो समतल भूमि में भी खेती कर सकते हैं।
  • उर्वरक प्रबंधन: प्रति एकड़ खेत में 55 किलोग्राम यूरिया, 155 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) और 20 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) का प्रयोग करें। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए आप खेत तैयार करते समय प्रति एकड़ खेत में 4 किलोग्राम स्टार्टर का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • नर्सरी तैयार करने की विधि: नर्सरी में बीज की बुवाई कतारों में करें। करीब 5-6 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज की बुवाई करें। बीज की गहराई 1-1.5 सेंटीमीटर होनी चाहिए। अधिक गहराई में बीज को अंकुरित होने में समस्या होती है। नर्सरी में पौधों को तैयार होने में 4 से 6 सप्ताह का समय लगता है।
  • पौधों की रोपाई: मुख्य खेत में समतल भूमि पर पौधों की रोपाई 2 फीट की दूरी पर करें। यदि मेड़ पर पौधों की रोपाई कर रहे हैं तो सभी पौधों के बीच करीब 2.5 फीट की दूरी रखें। जड़ों को 5 से 6 सेंटीमीटर की गहराई में रोपाई करें। पौधों की रोपाई शाम के समय करनी चाहिए।
  • सिंचाई प्रबंधन: फसल में मिट्टी में मौजूद नमी के आधार पर सिंचाई करें। गर्मी के मौसम में 2-3 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। ठंड के मौसम में 10 से 12 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। ठंड के मौसम में पाला की सम्भावना होने पर भी सिंचाई करें। इससे मिट्टी के तापमान को बढ़ाया जा सकता है। वर्षा होने पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है।
  • खरपतवार प्रबंधन: बैंगन की फसल में खरपतवार की समस्या से निजात पाने के लिए आवश्यकता के अनुसार निराई-गुड़ाई करें। बुआई के बाद, पहली निराई-गुड़ाई 20 से 25 दिनों के बाद किया जा सकता है। इसके अलावा आप रासायनिक दवाओं का प्रयोग कर के भी फसल को खरपतवारों से मुक्त रख सकते हैं। इसके लिए पौधों की रोपाई से पहले, प्रति एकड़ भूमि में 600 मिलीलीटर पेंडीमेथिलीन 38.7% CS (यूपीएल- दोस्त सुपर, बीएएसएफ- स्टॉम्प एक्स्ट्रा) का प्रयोग करें। चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए, पौधों की रोपाई से 1 सप्ताह पहले प्रति एकड़ खेत में 200 ग्राम मेट्रिब्यूज़िन 70% डब्ल्यूपी (धानुका- बैरियर, बायर- सेंकोर, इंदोरामा- शक्तिमान मेट्रिमैन, शिवालिक क्रॉप साइंस- सैकोन) का प्रयोग करें।
  • रोग एवं कीट प्रबंधन: बैंगन की फसल में रोग एवं कीटों का प्रकोप उपज और गुणवत्ता में कमी का बड़ा कारण बन सकते हैं। बैंगन की फसल में फल छेदक कीट, सफेद मक्खी, शीर्ष भेदक कीट, मिलीबग कीट, झुलसा रोग, कॉलर रॉट रोग, जड़ गलन रोग, जैसे कीट एवं रोगों का प्रकोप अधिक होता है। इन रोगों से फसल को बचने के लिए खेत में लगातार निरीक्षण करते रहें। किसी भी रोग या कीट के लक्षण नजर आने पर उचित दवाओं का प्रयोग करें। रोग एवं कीटों का प्रकोप बढ़ने पर तुरंत कृषि विशेषज्ञ से परामर्श करें।
  • फलों की तुड़ाई: बैंगन के फलों को तुड़ाई विभिन्न किस्मों के अनुसार अलग हो सकती है। सामान्यतौर पर पौधों की रोपाई से करीब 50 से 70 दिनों बाद फलों की तुड़ाई की जाती है। फलों की तुड़ाई शाम के समय करें।

बैंगन की खेती में आपको किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है? अपने जवाब एवं अनुभव हमें कमेंट के माध्यम से बताएं। कृषि संबंधी जानकारियों के लिए देहात के टोल फ्री नंबर 1800-1036-110 पर सम्पर्क करके विशेषज्ञों से परामर्श भी कर सकते हैं। इसके साथ ही इस पोस्ट को लाइक एवं कमेंट करना न भूलें। इस तरह की अधिक जानकारियों के लिए 'कृषि ज्ञान' चैनल को अभी फॉलो करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न | Frequently Asked Question (FAQs)

Q: बैंगन की खेती कौन से महीने में की जाती है?

A: बैंगन की खेती सभी मौसम में की जा सकती है। लेकिन आमतौर पर भारत में जून से अक्टूबर के महीनों के दौरान इसकी खेती की जाती है।

Q: बैंगन कितने दिन में फल देने लगता है?

A: पौधों की रोपाई के करीब 50 से 70 दिनों के बाद पौधों में फल आने शुरू हो जाते हैं। पौधों में फलों का आना इसकी किस्मों, जलवायु, और उचित देखभाल पर भी निर्भर करता है।

Q: बैंगन की ग्रोथ कैसे बढ़ाए?

A: बैंगन के पौधों के उचित विकास के लिए कई बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसकी खेती के लिए जल जमाव वाले स्थान का चयन न करें। फसल को रोग एवं कीटों से से बचाने का उचित प्रबंध करें। इसके साथ ही समय पर सिंचाई और सही मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग से भी पौधों का उचित विकास होता है।

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