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10 June
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धान की फसल में उर्वरक प्रबंधन | Fertilizer Management in Paddy Crop

भारत में खरीफ मौसम में धान की खेती प्रमुखता से की जाती है। धान के पौधों के उचित विकास के लिए पोषक तत्वों का बहुत महत्व है। धान की फसल में मुख्यतः नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटैशियम की आवश्यकता होती है। इसके अलावा धान के पौधों को कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी आवश्यकता होती है। अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी जांच के आधार पर करें। इसके साथ ही पौधों की अवस्था का भी विशेष ध्यान रखें। धान की फसल में उर्वरक प्रबंधन की विस्तृत जानकारी के लिए इस पोस्ट को ध्यान से पढ़ें।

धान की फसल में उर्वरकों की कमी से होने वाले नुकसान | Problems Caused due to Lack of Fertilizers in Paddy Crop

उपज में कमी: धान के पौधों में संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों का प्रयोग नहीं करने से पौधों के विकास में बाधा आती है या पौधों का विकास धीमी गति से होता है।

गुणवत्ता में कमी: पोषक तत्वों की कमी के कारण फसल की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है। खराब गुणवत्ता वाले अनाज की बाजार में कम कीमत मिल सकती है, जिससे किसानों को वित्तीय नुकसान हो सकता है।

कीट एवं रोगों का प्रकोप: उचित मात्रा में पोषक तत्वों का प्रयोग नहीं करने से पौधे कमजोर हो जाते हैं और उनकी रोग प्रतिधाक क्षमता में कमी आती है। जिससे फसलों में कई तरह के रोगों एवं कीटों के प्रकोप की संभावना बढ़ जाती है।

खेत की तैयारी के समय उर्वरक प्रबंधन | Fertilizer Management During Field Preparation

  • आर्गेनिक कार्बन के तौर पर प्रति एकड़ खेत में 4 टन पूरी तरह से विघटित गोबर की खाद मिलाएं।
  • यदि खेत में जिंक की कमी है तो प्रति एकड़ खेत में 8 किलोग्राम जिंक युक्त उर्वरक का प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 4 किलोग्राम 'देहात स्टार्टर' का प्रयोग करें। इससे जड़ों का बेहतर विकास होता है और पौधों को मजबूती मिलती है।

पौधों की रोपाई के समय उर्वरक प्रबंधन | Fertilizer Management During Transplantation

  • प्रति एकड़ खेत में 45 किलोग्राम डीएपी का प्रयोग करें।
  • फसल में नाइट्रोजन की कमी दूर करने के लिए प्रति एकड़ खेत में 33-35 किलोग्राम यूरिया का प्रयोग करें।
  • पोटाश की पूर्ति के लिए प्रति एकड़ खेत में 20 किलोग्राम एमओपी का प्रयोग करें।

पौधों के विकास के चरण में उर्वरक प्रबंधन | Fertilizer Management During Growth Stage

  • नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए पौधों की रोपाई के 25 दिनों बाद प्रति एकड़ खेत में 35 किलोग्राम यूरिया का प्रयोग करें।

धान के पौधों में अधिक मात्रा में कल्ले प्राप्त करने लिए उर्वरक प्रबंधन | Fertilizer Management to Obtain More Tillers

  • फसल में नाइट्रोजन की कमी दूर करने के लिए पौधों की रोपाई के 42 दिनों बाद प्रति एकड़ खेत में 35 किलोग्राम यूरिया का प्रयोग करें।
  • पोटाश की कमी दूर करने के लिए पौधों की रोपाई के 42 दिनों बाद प्रति एकड़ खेत में 10  किलोग्राम एमओपी का प्रयोग करें।
  • प्रति लीटर पानी में 1-2 मिलीलीटर ‘देहात न्यूट्रीवन जिंक ऑक्साइड’ का प्रयोग करें।
  • प्रति लीटर पानी में 2-3 मिलीलीटर ‘देहात न्यूट्रीवन बूस्ट मास्टर’ का प्रयोग करें।

धान के पौधों में बालियां बनने के समय उर्वरक प्रबंधन | Fertilizer Management During Panicle Development

  • पौधों की रोपाई के करीब 55-60 दिनों बाद 13:00:45 (देहात न्यूट्रीवन KNO3- 13:00:45) का प्रयोग करें।

फसलों में उर्वरकों के प्रयोग के समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? | Things to Keep in Mind While Using Fertilizers for Crops

  • मृदा परीक्षण: धान की फसल में उर्वरकों का प्रयोग करने से पहले मिट्टी की जांच कराना बहुत जरूरी है। इससे हम मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की सही मात्रा की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसके बाद इस जानकारी के आधार पर हम जिन पोषक तत्वों की कमी है उनकी पूर्ति कर सकते हैं।
  • उचित मात्रा: पौधों के बेहतर विकास के लिए संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों का प्रयोग करना बहुत जरूरी है। अत्यधिक या आवश्यकता से कम मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग के कई नुकसान देखे जा सकते हैं।
  • सही समय: फसल की वृद्धि के लिए सही समय पर पोषक तत्वों का प्रयोग करना आवश्यक है। सही समय पर उर्वरकों का प्रयोग करने से हम अधिक उपज के साथ गुणवत्तापूर्ण फसल प्राप्त कर सकते हैं।

अधिक मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग से होने वाले नुकसान | Effects of Excessive Use of Fertilizers

  • मिट्टी की गुणवत्ता: उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी अम्लीय हो सकती है जिससे इसकी उर्वरक क्षमता में कमी आ सकती है। इस कारण धीरे-धीरे फसल की उपज और गुणवत्ता में भी कम होने लगती है।
  • पर्यावरण पर दुष्प्रभाव: उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण की समस्या में वृद्धि होती है।
  • स्वास्थ्य पर खतरा: लम्बे समय तक आवश्यकता से अधिक मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करने से मिट्टी और फसलों में हानिकारक रसायनों का संचय हो सकता है, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
  • लागत में वृद्धि: अधिक मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग से कृषि में होने वाली लागत में वृद्धि होती है।
  • जैव विविधता में कमी: रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों को हानि हो सकती है। जिससे जैव विविधता और मिट्टी की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है।

क्या आप धान की फसल में उर्वरकों के प्रयोग से पहले मिट्टी की जांच कराते हैं? अपने जवाब हमें कमेंट के माध्यम से बताएं। बेहतर फसल प्राप्त करने के लिए इस तरह की अधिक जानकारियों के लिए 'कृषि ज्ञान' चैनल को तुरंत फॉलो करें। इसके साथ ही इस पोस्ट को लाइक और अन्य किसानों के साथ शेयर करना न भूलें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल | Frequently Asked Question (FAQs)

Q: धान के लिए कौन सा उर्वरक उपयोग करते हैं?

A: भारत में धान की खेती के लिए, किसान आमतौर पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम (एनपीके) उर्वरकों का उपयोग करते हैं। उपयोग किए जाने वाले एनपीके उर्वरकों की मात्रा मिट्टी के प्रकार, जलवायु और अन्य कारकों के आधार पर भिन्न हो सकती है। सामान्यतौर पर, किसान यूरिया को नाइट्रोजन के स्रोत के रूप में, सिंगल सुपरफॉस्फेट या डायमोनियम फॉस्फेट को फास्फोरस के स्रोत के रूप में और पोटाश के म्यूरेट को पोटेशियम के स्रोत के रूप में उपयोग करते हैं।

Q: धान में पोटाश का उपयोग कब करना चाहिए?

A: पोटाश पौधों की वृद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व है और मजबूत तनों और जड़ों के विकास के साथ-साथ फूलों और फलों के उत्पादन के लिए आवश्यक है। भारत में, पोटाश के आवेदन का समय फसल और मिट्टी के प्रकार पर निर्भर करता है। धान, गन्ना और कपास जैसी फसलों के लिए, पोटाश आमतौर पर विभाजित खुराक में लगाया जाता है। पोटाश की पहली खुराक बुवाई या रोपाई के समय लगाई जाती है, और बाद की खुराक बुवाई या रोपाई के 30-40 दिनों के नियमित अंतराल पर लगाई जाती है।

Q: धान की अच्छी पैदावार के लिए क्या करना चाहिए?

A: भारत में धान की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए अधिक उपज देने वाली किस्मों का चयन करना चाहिए। इसके साथ ही भूमि की तैयारी, बीज उपचार, सही विधि से रोपाई, पौधों से पौधों के बीच की दूरी, सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण, कीट और रोग प्रबंधन, सही समय पर फसल की कटाई, जैसी बातों का विशेष ध्यान रखें।

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