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1 May
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इन रोगों से अंगूर की उपज में हो सकती है कमी, जानें नियंत्रण के तरीके | Combatting Grape Yield Reduction: Effective Methods of Disease Control

इन दिनों किसानों का रुझान पारम्परिक फसलों से हट कर बागवानी फसलों की तरफ बढ़ता जा रहा है। इनमें अंगूर की बागवानी भी शामिल है। हमारे देश में सबसे ज्यादा अंगूर का उत्पादन महाराष्ट्र में किया जाता है। इसके अलावा कर्नाटक, तमिल नाडु, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, मिजोरम, तेलंगाना, पंजाब, जम्मू एवं कश्मीर, हरियाणा एवं पश्चिम बंगाल में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। बाजार में अच्छी कीमत मिलने के कारण किसानों के लिए इसकी खेती लाभदायक भी होती है। लेकिन कई बार कुछ रोग इसकी उपज में कमी का कारण बन सकते हैं। विभिन्न रोगों के कारण अंगूर की गुणवत्ता में भी कमी दर्ज की गई है। ऐसे में अंगूर की बेलों में लगने वाले कुछ प्रमुख रोगों के लक्षण एवं इन पर नियंत्रण की जानकारी के लिए इस पोस्ट को ध्यान से पढ़ें।

अंगूर के पौधों में लगने वाले कुछ प्रमुख रोग | Some major diseases affecting grape plants

चूर्णिल आसिता रोग से होने वाले नुकसान:

इस रोग की शुरुआत में अंगूर की पत्तियों के ऊपरी भाग पर सफेद रंग के धब्बे उभरने लगते हैं।

धीरे-धीरे ये इन धब्बों का आकार बढ़ने लगता है और पूरी पत्ती सफेद पाउडर की तरह पदार्थ से ढक जाते हैं।

रोग बढ़ने के साथ पौधों की शाखाओं और फलों पर भी सफेद धब्बे देखे जा सकते हैं। इस रोग के कारण प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में बाधा आती है। जिससे प्रभावित पत्तियां धीरे-धीरे पीली होने लगती हैं। इस रोग से प्रभावित पत्तियां सूख कर गिरने लगती हैं। पौधों के विकास में रुकावट उत्पन्न होने लगती है। इस रोग के कारण फसल की उपज और गुणवत्ता में भारी कमी देखी जा सकती है।

चूर्णिल आसिता रोग पर नियंत्रण के तरीके:

  • इस रोग को फैलने से रोकने के लिए प्रभावित पत्तियों को तोड़ कर नष्ट कर दें।
  • चूर्णिल आसिता रोग पर नियंत्रण के लिए नीचे दी गई दवाओं में से किसी एक का प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 300 मिलीलीटर एज़ोक्सिस्ट्रोबिन 11% + टेबुकोनाज़ोल 18.3% एस.सी. (देहात एजीटॉप) का प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 200 मिलीलीटर एज़ोक्सिस्ट्रोबिन 18.2% +डिफेनोकोनाजोल 11.4% एस.सी (देहात सिनपैक्ट) का प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 300 ग्राम टाटा ताकत (कैप्टन 70% + हेक्साकोनाज़ोल 5% WP) का प्रयोग करें।

मृदुरोमिल आसिता से होने वाले नुकसान: इस रोग से प्रभावित पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले या भूरे धब्बे उभरने लगते हैं। पत्तियों के नीचे की तरफ सफेद या भूरे रंग के धब्बे देखे जा सकते हैं। अंगूर के बेलों के विकास में बाधा आती है। पौधे कमजोर हो जाते हैं। फल समय से पहले गिरने लगते हैं। इस रोग के कारण फलों की पैदावार में कमी आने लगती है।

मृदुरोमिल आसिता पर नियंत्रण के तरीके:

  • रोग को फैलने से रोकने के लिए रोग से प्रभावित पौधों को नष्ट कर दें।
  • इस रोग पर नियंत्रण के लिए प्रति एकड़ खेत में 600-800 ग्राम मैंकोजेब 75% डब्लूपी (देहात डेम 45, कात्यायनी के जेब एम-45) का प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 350-400 ग्राम बेनालैक्सिल 8% + मैंकोजेब 65% डब्लूपी (फैंटिक एम) का प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 200 मिलीलीटर एज़ोक्सीस्ट्रोबिन 23% एससी का प्रयोग करें।

एंथ्राक्नोस रोग से होने वाले नुकसान: नए अंकुरण, नई पत्तियों एवं फूलों के साथ फलों पर भी इस रोग के लक्षण देखे जा सकते हैं। यह एक फफूंद जनित रोग है। प्रभावित पत्तियों पर छोटे अनियमित आकार के गहरे भूरे रंग के धब्बे उभरने लगते हैं। इन धब्बों के बीच का भाग धूसर और इसके किनारे भूरे रंग के हो जाते हैं। रोग का प्रकोप बढ़ने पर पौधों के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। गर्म तापमान और ज्यादा नमी वाले क्षेत्रों में यह रोग तेजी से फैल सकता है।

एंथ्राक्नोस रोग पर नियंत्रण के तरीके:

  • इस रोग पर नियंत्रण के लिए प्रति एकड़ खेत में 600-800 ग्राम मैंकोजेब 75% डब्लूपी (देहात डेम 45) का प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 450 ग्राम कार्बेन्डाजिम 12% + मैंकोजेब 63% डब्लूपी (देहात साबू) का प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 150 लीटर पानी में 200 ग्राम एज़ोक्सिस्ट्रोबिन 18.2% +डिफेनोकोनाजोल 11.4% एस.सी (देहात सिंपैक्ट) मिला कर छिड़काव करने से भी इस रोग पर नियंत्रण किया जा सकता है।
  • प्रति एकड़ खेत में 200 लीटर पानी में 300 ग्राम क्लोरोथालोनिल 75% डब्ल्यू पी (सिंजेंटा कवच) मिला कर छिड़काव करें।
  • 200 लीटर पानी में 100 ग्राम टेबुकोनाज़ोल 50% + ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन 25% डब्लू जी (बायर नेटिवो) मिला कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

आपके अंगूर की बेलों में किस रोग का प्रकोप अधिक होता है? अपने जवाब हमें कमेंट के द्वारा बताएं। कृषि संबंधी जानकारियों के लिए देहात के टोल फ्री नंबर 1800-1036-110 पर सम्पर्क करके विशेषज्ञों से परामर्श भी कर सकते हैं। इसके अलावा, 'किसान डॉक्टर' चैनल को फॉलो करके आप फसलों के सही देखभाल और सुरक्षा के लिए और भी अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ ही इस पोस्ट को लाइक एवं शेयर करके आप इस जानकारी को अन्य किसानों तक पहुंचा सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल | Frequently Asked Question (FAQs)

Q: अंगूर के सबसे आम रोग कौन से हैं?

A: भारत में अंगूर को प्रभावित करने वाले कुछ सामान्य कवक रोग पाउडर मिल्ड्यू, डाउनी मिल्ड्यू, एन्थ्रेक्नोज और काला सड़न रोग हैं। इन रोगों के कारण अंगूर की उपज के साथ गुणवत्ता में भी भरी कमी हो सकती है।

Q: अंगूर की बीमारी का इलाज कैसे करें?

A: अंगूर की बेलों में लगने वाले रोगों पर नियंत्रण के लिए पौधों के संक्रमित हिस्सों को तोड़ कर नष्ट कर दें। रोगों पर नियंत्रण के लिए उचित मात्रा में फफूंद नाशक दवाओं का प्रयोग करें। इसके साथ ही सिंचाई का भी विशेष ध्यान रखें। आवश्यकता से अधिक सिंचाई करने से नमी बढ़ती है। जिससे रोगों को बढ़ावा मिल सकता है।

Q: अंगूर के झुलसने का क्या कारण है?

A: अंगूर की पत्तियों एवं बेलों के झुलसने के कई कारण हैं। झुलसा रोग के कारण यह समस्या उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में इस रोग पर नियंत्रण के लिए उचित रासायनिक दवाओं का प्रयोग करें। इसके साथ ही कई बार पानी की कमी होने पर या पोषक तत्वों की कमी होने से भी पत्तियां एवं बेलें झुलसी हुई सी नजर आने लगती हैं। पोषक तत्वों की कमी दूर करने के लिए उचित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करें और सही समय पर सिंचाई करें।

Q: अंगूर के लिए सबसे अच्छा कवकनाशी कौन सा है?

A: अंगूर के लिए कवकनाशी का चयन रोग के प्रकार के आधार पर करना चाहिए। कवकनाशी के प्रयोग से पहले कृषि विशेषज्ञों से अवश्य परामर्श करें।

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