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18 Apr
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अमरुद की खेती: रोग, लक्षण एवं उपचार (Guava cultivation: diseases, symptoms and treatment)


भारत में अमरूद आम, केला और नीबू के बाद चौथे नम्बर की व्यावसायिक फसल है। बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडू के अलावा इसकी खेती पंजाब और हरियाणा में भी की जा रही है। अमरुद में कई औषधीय गुण भी होते है। जिस वजह से इसका उपयोग दातों से संबंधी रोगों को दूर करने में किया जाता है। अमरूद को गरीबों का सेब भी कहा जाता है। यह विटामिन सी, विटामिन बी, कैल्शियम, आयरन और फास्फोरस युक्त होता है। अमरुद से जूस, जैम, जेली और बर्फी भी बनायीं जाती है। किसान भाई अमरुद की एक बार बागवानी कर लगभग 30 वर्ष तक पैदावार ले सकते हैं। किसान एक एकड़ में अमरूद की बागवानी से 10 से 12 लाख रूपए सालाना कमाई आसानी से कर सकते हैं।

कैसे करें अमरुद की खेती? (How to cultivate guava?)

जलवायु : इसकी खेती भारत के किसी भी क्षेत्र में आसानी से की जा सकती है। इसका पौधा अधिक सहिष्णु और उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाला होता है। इसलिए इसकी खेती सबसे अधिक शुष्क और अर्ध शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में की जाती है। अमरुद के पौधे सर्द और गर्म दोनों ही जलवायु को आसानी से सहन कर लेते है। किन्तु सर्दियों के मौसम में गिरने वाला पाला इसके छोटे पौधों को हानि पहुंचाता है। इसके पौधे अधिकतम 30 डिग्री तथा न्यूनतम 15 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है, तथा पूर्ण विकसित पौधा 44 डिग्री तक के तापमान को भी सहन कर सकता है।

मिटटी : इसकी खेती हल्की से भारी और कम जल निकास वाली मिट्टी में आसानी से की जा सकती है। लेकिन अच्छी व्यापारिक खेती के लिए बलुई दोमट से चिकनी मिट्टी को सबसे उपयुक्त माना जाता है। क्षारीय मिट्टी में इसके पौधों पर उकठा रोग लगने का खतरा होता हैं। इसलिए इसकी खेती में भूमि का पी.एच मान 6 से 6.5 के मध्य होना चाहिए।

प्रजातियाँ : अमरूद की बहुत सी किस्में प्रचलित हैं जैसे की इलाहाबादी सफेदा,सरदार, सेबनुमा अमरूद, इलाहाबादी सुरखा, बेहट कोकोनट एवं ललित इलाहाबादी, सफेदा एवं सरदार इसी को लखनऊ -49 कहते हैं, अपने स्वाद एवं फलत के लिए विशेष तौर से विख्यात है।

खेत की तैयारी : इसके पौधे की रोपाई हेतु पहले 60 सेमी चौड़ाई, 60 सेमी लम्बाई, 60 सेमी गहराई के गड्ढे तैयार करके 20-25 किग्रा सड़ी गोबर की खाद 250 ग्राम सुपर फास्फेट तथा 40-50 ग्राम फालीडाल धूल ऊपरी मिट्टी में मिलाकर गड्ढों को भर कर सिंचाई कर देते हैं इसके पश्चात पौधे की पिंडी के अनुसार गड्ढे को खोदकर उसके बीचों बीच लगाकर चारों तरफ से अच्छी तरह दबाकर फिर हल्की सिंचाई कर देते हैं।

पौधरोपण : पौध रोपण के लिए जुलाई, अगस्त तथा सितम्बर माह को उपयुक्त माना जाता है। जहां पर सिंचाई की उचित व्यवस्था है समस्या नहीं होती है वहां पर फरवरी मार्च में भी रोपण किया जा सकता है। अमरूद के पौधों का लाईन से लाईन 5 मीटर तथा पौधे से पौधे 5 मीटर अथवा लाईन से लाईन 6 मीटर और पौधे से पौधे 6 मीटर की दूरी पर रोपण किया जा सकता है।

खाद और उर्वरक :

  • पौधा लगाने से पहले गड्ढा तैयार करते समय प्रति गड्ढा 20 से 25 किग्रा सड़ी गोबर की खाद डालकर तैयार गड्ढे में पौध लगते हैं। इसके पश्चात प्रति वर्ष 5 साल तक इस प्रकार की खाद दी जाती है।
  • एक वर्ष की आयु के पौधे पर 15 किलोग्राम गोबर की खाद, 260 ग्राम यूरिया, 375 ग्राम सुपर फास्फेट तथा 500 ग्राम पोटेशियम सल्फेट।
  • दो वर्ष के पौधे के लिए 30 किलोग्राम गोबर की खाद, 500 ग्राम यूरिया, 750 ग्राम सुपर फास्फेट एवं 200 ग्राम पोटेशियम सल्फेट।
  • तीन साल के पौधे के लिए 45 किलोग्राम गोबर की खाद, 780 ग्राम यूरिया, 1125 ग्राम सुपर फास्फेट एवं 300 ग्राम पोटेशियम सल्फेट।
  • चार साल के पौधे के लिए 60 किलोग्राम गोबर की खाद, 1050 ग्राम यूरिया, 1500 ग्राम सुपर फास्फेट एवं 400 ग्राम पोटेशियम सल्फेट।
  • पांच साल के पौधे के लिए 75 किलोग्राम गोबर की खाद, 1300 ग्राम यूरिया, 1875 ग्राम सुपर फास्फेट एवं 500 ग्राम पोटेशियम सल्फेट की आवश्यकता पड़ती है।

सिंचाई प्रबंधन : अमरुद उत्पादन में सिंचाई पर ध्यान देना बहुत ही जरुरी है। छोटे पौधे की सिंचाई शरद ऋतु में 15 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए तथा गर्मियों के दिनों में 7 दिन के अंतराल पर करनीं चाहिए। लेकिन एक बार पेड़ बड़ा हो जाए  तो उसके बाद जरूरत के अनुसार ही सिंचाई करनी चाहिए।

रोग प्रबंधन :

  1. उकठा रोग (विल्ट रोग) : उकठा रोग के कारण पत्तियाँ पीली और मुरझा जाती हैं।  इसके अलावा टहनियाँ और शाखाएं सूख कर धीरे-धीरे पौधा गल कर मर जाता है। यह रोग खराब जल निकासी वाली मिट्टी में और उच्च आर्द्रता और वर्षा की अवधि के दौरान ज्यादातर होता है।

नियंत्रण :

  • इसे नियंत्रित करने के लिए खेतों में उचित सिंचाई, जल निकासी की व्यवस्था करनी चाहिए साथ ही बाग़ में स्वच्छता रखनी चाहिए। संक्रमित पौधे के हटा कर नष्ट कर देना चाहिए।
  • इसको नियंत्रित करने के लिए कार्बेन्डाजिम और थायोफेनेट-मिथाइल फफूंदनाशी का इस्तेमाल करें।
  1. कैंकर रोग के लक्षण : यह रोग ज्यादातर हरे फलों पर लगता है, पत्तियों पर इस रोग का प्रकोप बहुत ही कम होता है इस रोग के कारण फलों पर एक बहुत ही छोटा भूरे अथवा तांबे के रंग का गोल भाग दिखाई देता है, जो आगे चलकर बड़ा होता हुआ फल की बाहरी छिलके को नुकसान पहुँचता है। इस रोग के लगने पर संक्रमित क्षेत्र उबड़ खाबड़ दिखता है, रोग के कारण फल के बाहरी आवरण व गूदे के एक हिस्से पर संक्रमित होने के लक्षण दिखते हैं और अत्यधिक संक्रमण होने पर फल फट जाता है जिससे बीज दिखने लगता है। संक्रमित फल का विकास रूक जाता है और फल कठोर होकर गिर जाते हैं।  बारिश में छोटे-छोटे लाल धब्बे फलों पर दिखते हैं जो शीत ऋतु आते-आते बड़े हो जाते हैं।

नियंत्रण :

  • संक्रमित भाग और फलों को नष्ट कर दें और बाग में स्वच्छता बनाए रखें। वायु संचारण और सूर्य के प्रकाश के प्रवेश में सुधार के लिए पेड़ों की छंटाई करने से भी रोग की संभावनाएं कम की जा सकती है।
  • इस रोग को नियंत्रित करने के लिए कॉपर आधारित फफूंदनाशी जैसे कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, कॉपर हाइड्रॉक्साइड और कॉपर सल्फेट का उपयोग किया जाता है। ये कवकनाशी रोग को नियंत्रित करने में प्रभावी होते हैं जब रोग स्थापित होने से पहले एक निवारक उपाय के रूप में लागू किया जाता है।
  • संक्रमण के शुरुआती समय में 15 दिनों के अंतराल पर 1 प्रतिशत बोर्डो मिश्रण या चूने के सल्फर का 3 से 4 बार छिड़काव करके नियंत्रित किया जा सकता है।
  1. फल धब्बा रोग : इसके कारण अमरूद के पौधे की पत्तियों और फलों पर हरे-काले धब्बे दिखाई देते हैं। धब्बे आकार में गोलाकार या अनियमित हो सकते हैं और आकार में कुछ मिलीमीटर से लेकर कई सेंटीमीटर व्यास तक हो सकते हैं। संक्रमित पत्तियां विकृत हो कर समय से पहले गिर जाती हैं।

नियंत्रण :

  • इस बीमारी को नियंत्रित करने के लिए, बाग में साफ़ सफाई रखें। रोग को फैलने से रोकने के लिए संक्रमित पत्तियों और फलों को हटा दें या नष्ट कर दें।
  • इसके अलावा, हवा और सूरज की रोशनी को आसानी से पेड़ तक पहुचानें के लिए पेड़ों की छंटाई करें जिससे इस बीमारी को कम करने में मदद मिल सकती है।
  • इसके अलावा कॉपर आक्सीक्लोराइड (0.3 प्रतिशत) फफूँदनाशी दवा का प्रयोग 15 दिन के अंतराल पर तीन से चार बार छिड़काव करें।

अमरुद की फसल में लगने वाले प्रमुख किट : फल मक्खी, फल बेधक कीट, अनार की तितली, जड़ गांठ सूत्रकृमि, मिलीबग कीट है।

आपको अमरुद में सबसे ज्यादा किस कीट की समस्या आती हैं? अपना जवाब एवं अनुभव हमें कमेंट करके बताएं। इसी तरह की अन्य रोचक एवं महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए 'किसान डॉक्टर' चैनल को अभी फॉलो करें। और अगर पोस्ट पसंद आयी तो इसे लाइक करके अपने किसान दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल | Frequently Asked Question (FAQs)

Q: अमरूद का पेड़ सूखने लगे तो क्या करना चाहिए?

A: अमरूद के पौधे के तने के आसपास गुड़ाई करें और उस मिट्टी में गोबर की खाद रासायनिक फर्टिलाइजर एनपीके का उपयोग करें। साथ ही पौधे की समयानुसार सिंचाई करें।

Q: अमरूद के फल का साइज कैसे बढ़ाएं?

A: फलों का साइज बढ़ाने के लिए फूल आने से पहले 0.4% बोरिक एसिड और 0.3% जिंक सल्फेट का छिड़काव करने से फल का आकार बढ़ जाता है।

Q: अमरूद का पेड़ कितने दिनों में फल देने लगता है?

A: अमरूद में फूल से फल बनने की प्रक्रिया में लगभग पांच माह लगते है। जब फल का रंग बदलने लग जाये तब तुड़ाई प्रारम्भ कर देनी चाहिए । एक परिपक्व वृक्ष से 40-50 किलोग्राम फल प्राप्त हो जाते है।

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