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22 Apr
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कटहल की खेती | Jackfruit Cultivation

भारतीय कृषि समृद्धि का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें विभिन्न प्रकार के फलों की खेती शामिल है। कई राज्यों में कटहल की खेती एक लाभकारी मानी जाती है। यह एक बड़ा और ऊर्जावान फल है। इसमें उच्च मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जैसे कि विटामिन, कैल्शियम, पोटैशियम और फाइबर, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं। इसमें विटामिन सी की भरपूर मात्रा होती है, जो शरीर को मजबूती प्रदान करती है और रोगों से लड़ने में मदद करती है। कटहल की खेती एक आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इससे किसानों को अच्छा मुनाफा होता है और वह अपने परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकते हैं। इसमें उचित तकनीकों का प्रयोग करके किसान अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इसे उच्च तापमान वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता है। इसका फल विभिन्न रूपों में उपयोग किया जा सकता है, जैसे कटहल के कच्चे फलों से सब्जी, अंचार आदि तैयार किए जाते हैं और पके फलों को अन्य सभी फलों की तरह खाया जाता है। एक बार कटहल के पौधों को लगा कर कई वर्षों तक फल प्राप्त किया जा सकता है। इस पोस्ट में बताई गई बातों को ध्यान में रख कर आप कटहल की अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं।

कटहल की खेती कैसे करें? | How to cultivate Jackfruit?

  • जलवायु: कटहल की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए इसकी खेती मध्यम से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में की। गर्म जलवायु वाले क्षेत्र कटहल के खेती के लिए उपयुक्त है।
  • भूमि का चयन: लगभग सभी किस्मों की मिट्टी में कटहल की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। लेकिन इसकी बेहतर पैदावार के लिए दोमट मिट्टी सर्वोत्तम है। मिट्टी का पीएच स्तर 6 से 7 के बीच होना चाहिए।
  • खेत की तैयारी: खेत को तैयार करने के लिए सबसे पहले अच्छी तरह जुताई करें। जुताई के बाद खेत में पाटा लगाकर खेत की मिट्टी को समतल बना लें। इसके बाद पौधों की रोपाई के लिए 10 मीटर की दूरी पर 1 मीटर चौड़ा, 1 मीटर लम्बा और 1 मीटर गहरा गड्ढा तैयार करें। 15 दिनों तक सभी गड्ढों को खुला रहने दें। इसके बाद मिट्टी में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिला कर गड्ढों को भरें।
  • पौधों की रोपाई: कटहल विकसित पौधा काफी बड़ा होता है। इसलिए सभी पौधों के बीच करीब 10 मीटर की दूरी रखें। खेत में पहले से तैयार किए गए गड्ढों में 1-1 पौधे की रोपाई करके हल्की सिंचाई करें।
  • उर्वरक प्रबंधन: कटहल प्रति वर्ष फल देने वाला पौधा/वृक्ष है। प्रत्येक पौधे को 20-25 किलोग्राम गोबर की खाद की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही जुलाई के महीने में प्रत्येक पौधे में 100 ग्राम यूरिया, 200 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) और 100 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) का प्रयोग करें। पौधों के विकास के साथ उर्वरकों की मात्रा भी बढ़ानी चाहिए। पौधों के 10 वर्ष पूरे होने के बाद प्रत्येक पौधे में 80-100 किलोग्राम गोबर की खाद, 1 किलोग्राम यूरिया, 2 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) और 1 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) का प्रयोग करें। खाद का प्रयोग करने से पहले मुख्य तने से करीब 1-2 मीटर दूरी पर गोलाई में 25-30 सेंटीमीटर गहरा गड्ढा तैयार करें। इन गड्ढों में उर्वरकों को डाल कर मिट्टी से ढकें।
  • बुवाई की विधि: अच्छी तरह से तैयार खेत में 1.5 मीटर की दूरी पर मेड़ बना लें और बीजों के बीच  23 से 35 इंच की दूरी होना चाहिए। बीज की बुवाई 1-2 सेंटीमीटर गहराई पर करें। मेड़ों पर बीज बोने के लिए गढ्ढे बना लें और प्रत्येक गड्डे में 2 बीजों की बुआई करें।
  • सिंचाई: कटहल के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। छोटे पौधों में गर्मी के मौसम में सप्ताह में 1 बार सिंचाई करें। बड़े वृक्षों में गर्मी के मौसम में 15 दिनों के अंतराल पर और ठंड के मौसम में 25-30 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। नवंबर-दिसंबर महीने में कटहल के वृक्षों में फूल आने लगते हैं। इसलिए इस समय सिंचाई का कार्य बंद कर दें। खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था करें।
  • खरपतवार प्रबंधन: खेत में खरपतवार की समस्या से निजात पाने के लिए आवश्यकता के अनुसार निराई-गुड़ाई करें। यदि कटहल के साथ किसी अन्य फसल की खेती नहीं कर रहे हैं तो सामान्यतः वर्ष में 2 बार जुताई की जाती है। इससे खरपतवारों की समस्या से छुटकारा मिलता है।
  • रोग और कीट नियंत्रण: कटहल की फसल में मिली बग, तना छेदक कीट, फल सड़न रोग, गुलाबी धब्बा रोग, जैसे रोग एवं कीटों का प्रकोप अधिक होता है। फसल को रोगों और कीटों से बचाने के लिए समय-समय पर रोग प्रबंधन और कीट प्रबंधन के उपायों का उपयोग करें। किसी भी रोग एवं कीट के लक्षण नजर आने पर तुरंत कीटनाशक एवं फफूंदनाशक दवाओं का प्रयोग करें।
  • फलों की तुड़ाई एवं पैदावार: पौधों की रोपाई के करीब 3 से 4 वर्षों बाद फल लगने शुरू हो जाते हैं। कटहल के पेड़ में 12 वर्षों तक भरपूर मात्रा में फल आते हैं। इसके बाद फलों की मात्रा धीरे-धीरे कम होने लगती है। कटहल के एक पेड़ से करीब 500 से 1,000 किलोग्राम तक कटहल की उपज होती है। हालांकि, इसकी उपज विभिन्न किस्मों, मौसम एवं क्षेत्रों के अनुसार कम या अधिक हो सकती है।

क्या आप कटहल की खेती के साथ किसी अन्य फसल की भी खेती करते हैं? अपने जवाब हमें कमेंट के द्वारा बताएं। कृषि संबंधी जानकारियों के लिए देहात के टोल फ्री नंबर 1800-1036-110 पर सम्पर्क करके विशेषज्ञों से परामर्श भी कर सकते हैं। इस तरह की अधिक जानकारियों के लिए 'बागवानी फसलें' चैनल को तुरंत फॉलो करें। इसके साथ ही इस पोस्ट को लाइक एवं कमेंट करना न भूलें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल | Frequently Asked Question (FAQs)

Q: कटहल की खेती कहां की जाती है?

A: कटहल की खेती भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में की जा सकती है। असम, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल के साथ दक्षिण भारत के राज्यों में भी इसकी बागवानी बड़े पैमाने पर की जाती है।

Q: क्या कटहल की खेती बीज की रोपाई के द्वारा की जा सकती है?

A: जी हां, कटहल की खेती बीज के द्वारा भी की जा सकती है। इसके लिए पके हुए फलों के बीज की रोपाई करके पौधे तैयार करें। इसके बाद मुख्य खेत में पौधों की रोपाई करें।

Q: कटहल के साथ और किन फसलों की खेती की जा सकती है?

A: कटहल के पेड़ बड़े और छांव देने वाले यानी घने होते हैं। इसलिए जमीन की सतह तक धूप कम आती है या सीधी धूप नहीं आती है। इसलिए ऐसे फसलों का चयन करें जिन्हें धूप की आवश्यकता कम होती है। कटहल के साथ आप इलायची, काली मिर्च, आदि की खेती सफलतापूर्वक कर सकते हैं।

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