पोस्ट विवरण
सुने
कृषि
करेला
सब्जियां
कृषि ज्ञान
26 Apr
Follow

करेला की खेती से पहले जानें उपयुक्त मिट्टी, किस्में एवं खेत की तैयारी। (Know suitable soil, varieties and field preparation before cultivating bitter gourd.)


करेला की फसल का सब्जियों में का प्रमुख स्थान है। यह स्वाद में कड़वी होती है, इसके उत्पादन के लिए गर्म और आद्र जलवायु उपयुक्त होता है। करेला कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है इसकी माँग लगातार बढ़ती जा रही है इसके कारण करेले की खेती करने वाले किसान कम समय में अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

कैसे करें करेले की खेती? (How to cultivate bittergourd?)

मिट्‌टी : करेले की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी और जलोढ़ मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी  गयी है।  इसके अलावा इसकी खेती लगभग सभी प्रकार की मिटटी में की जा सकती है जिसमें पोषक तत्व उपलब्ध हों और साथ उर्वरक क्षमता अच्छी हो। करेले की बुवाई के लिए मिटटी का पी.एच. मान 6.5 से 8.00 के बीच होना चाहिए।

तापमान : करेले में बेहतर उत्पादन पाने के लिए 20 से 40 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान अच्छा माना गया है। इसकी खेती के लिए ज्यादा तापमान की आवश्यकता नहीं होती, और इसकी खेती के लिए खेतों में नमी की जरूरत होती है।

उन्नत किस्में : करेले में अच्छे उत्पादन के लिए सही और उन्नत किस्मों का चयन करना आवश्यक है। विभिन्न क्षेत्रों एवं मौसम के अनुसार करेले की विभिन्न किस्मों की खेती करनी चाहिए। अगर आप करेले की खेती करना चाहते हैं तो यहां से कुछ उन्नत किस्मों के नाम एवं उनकी विशेषताएं जान सकते हैं।

  • अर्का हरित : इसके फल मध्यम आकार के होते हैं। अन्य किस्मों की तुलना में यह कम कड़वे होते हैं। इस किस्म के फलों में बीज भी कम होता है। इसकी खेती गर्मी एवं वर्षा के मौसम में की जा सकती है। प्रत्येक बेल से 30 से 40 फल प्राप्त किए जा सकते हैं। इस किस्म के फलों का वजन करीब 80 ग्राम होता है। प्रति एकड़ खेत से लगभग 36 से 48 क्विंटल तक पैदावार होती है।
  • पूसा हाइब्रिड 1 : वर्ष 1990 में इसे विकसित किया गया। उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में खेती करने के लिए यह उपयुक्त किस्म है। इसके फल हरे एवं चमकदार होते हैं। इसकी खेती वसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु एवं वर्षा ऋतु में की जा सकती है। पहली तुड़ाई 55 से 60 दिनों में कर सकते हैं। प्रति एकड़ जमीन से 80 क्विंटल करेला प्राप्त किया जा सकता है।
  • पूसा हाइब्रिड 2 : इस किस्म को वर्ष 2002 में विकसित किया गया। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा एवं दिल्ली में खेती करने के लिए यह उपयुक्त किस्म है। इस किस्म के फलों का रंग गहरा हरा होता है। फलों की लंबाई एवं मोटाई मध्यम होती है। करीब 52 दिनों बाद पहली तुड़ाई की जा सकती है। प्रत्येक करेला करीब 85 से 90 ग्राम का होता है। प्रति एकड़ खेत से 72 क्विंटल पैदावार होती है।
  • पूसा विशेष : उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में फरवरी से जून तक इसकी खेती की जा सकती है। इसके फल मोटे एवं गहरे चमकीले हरे रंग के होते हैं। इसका गूदा मोटा होता है। पौधों की लंबाई करीब 1.20 मीटर होती है। प्रत्येक फल करीब 155 ग्राम के होते हैं। प्रति एकड़ जमीन से 60 क्विंटल तक पैदावार होती है।
  • पंजाब करेला 1 : इस किस्म के करेले आकार में लंबे, पतले एवं हरे रंग के होते हैं। बुवाई के करीब 66 दिनों बाद पहली तुड़ाई की जा सकती है। इसके प्रत्येक फल लगभग 50 ग्राम के होते हैं। प्रति एकड़ जमीन में खेती करने पर करीब 50 क्विंटल तक करेले प्राप्त किए जा सकते हैं।
  • कोयंबटूर लौंग : इस किस्म के पौधे अधिक फैलते हैं। पौधों में फलों की संख्या भी अधिक होती है। खरीफ मौसम में खेती के लिए यह उपयुक्त किस्म है। प्रत्येक फल का वजन करीब 70 ग्राम होता है। प्रति एकड़ भूमि से 32 से 40 क्विंटल तक पैदावार होती है।
  • प्रिया : इस किस्म के करेले के फल करीब 19 सेंटीमीटर लंबे होते हैं। बीज की बुवाई के 60 दिनों बाद फलों की पहली तुरई की जा सकती है। प्रत्येक बेल में करीब 35 पल आते हैं। दक्षिण भारतीय क्षेत्रों में इसकी खेती वर्ष में तीन बार सफलतापूर्वक की जा सकती है। उत्तर भारतीय क्षेत्रों में अगस्त सितंबर में इसकी खेती की जाती है। प्रति एकड़ भूमि से 32 क्विंटल तक पैदावार होती है।

इन किस्मों के अलावा हमारे देश में कई अन्य किस्मों की भी खेती करते हैं।

खेत की तैयारी :

  • करेले की बुवाई करने से पहले खेत की अच्छी तरह से गहरी जुताई ट्रैक्टर या फिर कल्टीवेटर के माध्यम से करें।
  • फिर खेत में पाटा चला कर खेत को समतल कर लें।
  • इसके बाद खेत को कुछ समय के लिए खाली छोड़ दें और ध्यान रखें की खेत में कीट-पतंग या फिर खरपतवार नहीं होनें चाहिए।
  • खेत तैयार करते समय प्रति एकड़ खेत में 10 से 15 टन अच्छी तरह से गली हुई रूड़ी की खाद मिलाएं। प्रति एकड़ खेत में 30 किलोग्राम यूरिया,125 किलोग्राम एस.एस.पी (सिंगल सुपर फासफेट) एवं एम.ओ.पी (म्यूरेट ऑफ पोटाश) 35 किलोग्राम की आवश्यकता होती है। बुवाई से पहले एस.एस.पी और एम.ओ.पी की पूरी मात्रा और यूरिया की एक तिहाई मात्रा का प्रयोग करें।
  • बची हुई यूरिया का उपयोग बुवाई के 30 दिनों बाद करें। बुवाई के समय खाद को कतारों में बीज के ठीक नीचे डालें।

क्या आप करेले की खेती करते हैं? अपना जवाब एवं अनुभव हमें कमेंट करके बताएं। इसी तरह की अन्य रोचक एवं महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए 'कृषि ज्ञान' चैनल को अभी फॉलो करें। और अगर पोस्ट पसंद आयी तो इसे लाइक करके अपने किसान दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल | Frequently Asked Question (FAQs)

Q: करेला कितने दिन में फल देने लगता है?

A: करेले के बीज बोने के लगभग 55 से 60 दिनों के बाद पौधों में फल आने लगते हैं।

Q: करेले कौन से महीने में लगाना चाहिए?

A: करेले की बुवाई के लिए सबसे उचित समय बरसात का होता हैं इसलिए इनकी बुवाई मई से जून के महीनें में करनी चाहिए और अगर आप सर्दियों में करेले की खेती करना चाहते हैं तो जनवरी से फरवरी का महीना अच्छा माना जाता है।

40 Likes
Like
Comment
Share
फसल चिकित्सक से मुफ़्त सलाह पाएँ

फसल चिकित्सक से मुफ़्त सलाह पाएँ