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18 Dec
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पपीता में कैसे करें वायरस का प्रबंधन

पपीता में कैसे करें वायरस का प्रबंधन

पपीता के पौधों में वायरस रोगों का प्रकोप अधिक होता है। इन रोगों में लीफ कर्ल वायरस रोग एवं मोजेक वायरस रोग भी शामिल है। बहुत तेजी से फैलने वाले इन रोगों के कारण 4 से 5 दिनों में पूरे खेत की फसल प्रभावित हो सकती है। पपीता के अलावा इन रोगों से तरबूज, मिर्च, टमाटर, बैंगन, कद्दू, लौकी, करेला, तुरई, सेम, आदि कई फसलें प्रभावित होती हैं।

लीफ कर्ल वायरस रोग: इसे पर्ण कुंचन रोग रोग के नाम से भी जाना जाता है। इस रोग के होने पर प्रभावित पौधों की पत्तियां छोटी एवं क्षुर्रीदार हो जाती हैं। पत्तियों का आकार विकृत हो जाता है। पत्तियां नीचे की तरफ मुड़ने लगती हैं। प्रभावित पौधों में फूल कम आते हैं। जिससे उपज में भारी कमी हो सकती है। रोग बढ़ने पर पौधों का विकास रुक जाता है।

सफेद मक्खी के द्वारा इस रोग को तेजी से फैलाने का काम करती हैं।

नियंत्रण:

  • इस रोग पर नियंत्रण के लिए प्रति एकड़ खेत में 100 मिलीलीटर 'कटरा वायरस-जी विषाणुनाशक' का प्रयोग करें।
  • सफेद मक्खी पर नियंत्रण के लिए प्रति एकड़ खेत में 3 से 4 फेरोमेन ट्रैप का प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 200 लीटर पानी में 40-80 ग्राम थियामेथोक्सम 25% WG मिला कर छिड़काव करें। यह दवा बाजार में 'देहात एसीयर' एवं 'सिंजेंटा एक्टारा' के नाम से उपलब्ध है।

मोजेक वायरस रोग: इस रोग का प्रकोप पौधों पर किसी भी अवस्था में हो सकता है। इस रोग के लक्षण पौधों की नई पत्तियों पर सबसे पहले नजर आते आते हैं। प्रभावित पत्तियों पर चितकबरे गहरे हरे-पीले धब्बे दिखाई देते हैं। पत्तियां खुरदरी हो जाती हैं। कई बार पत्तियों की नसें भी मोटी हो जाती हैं। कुछ समय बाद पत्तियां पूरी तरह से पीली होकर सूख जाती हैं।

नियंत्रण:

  • बुवाई के लिए रोग रहित एवं उपचारित बीज का ही प्रयोग करें।
  • रोग की प्रारंभिक अवस्था में प्रति लीटर पानी में 2 से 3 मिलीलीटर नीम का तेल मिलाकर छिड़काव करें।
  • इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एस एल (कॉन्फिडोर) 100 मिली प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 100 मिलीलीटर फ्लूबेंडामाइड 19.92% + थायक्लोप्रीड 19.92% (बेल्ट एक्स्पर्ट- बायर) का प्रयोग करें।

रिंग स्पॉट वायरस: प्रभावित पौधों के तने एवं डंठल पर पानी से भरे हुए धब्बे नजर आते हैं। रोग बढ़ने पर फलों पर भी ये धब्बे देखे जा सकते हैं। पत्तियां विकृत हो जाती हैं और उन पर फफोले उभरने लगते हैं। एफिड इस रोग को एक पौधे से दूसरे पौधों में फैलाने का काम करते हैं।

नियंत्रण:

  • इस रोग के प्रति सहनशील किस्मों का चयन करें।
  • रोग से बुरी तरह प्रभावित पौधों को नष्ट कर दें।
  • प्रति एकड़ खेत में 200 मिलीलीटर इंडोक्साकार्ब 14.5% + एसिटामिप्रिड 7.7% एस सी (काइट - घरडा केमिकल) का प्रयोग करें।
  • प्रति एकड़ खेत में थियामेथोक्सम 12.6% + लैम्बडासीहैलोथ्रिन 9.5% जेड सी (देहात एन्टोकिल) की 80-100 मिलीलीटर मात्रा को 200 लीटर पानी में मिला कर प्रयोग करें। यह दवा बाजार में (सिंजेंटा आलिका) के नाम से भी उपलब्ध है।

पपीता के पौधों में वायरस जनित रोगों पर नियंत्रण के लिए आप किन दवाओं का प्रयोग करते हैं? अपने जवाब हमें कमेंट के माध्यम से बताएं। इसके साथ ही इस पोस्ट को लाइक और शेयर करना न भूलें। इस तरह की अधिक जानकारियों के लिए 'बागवानी फसलें' चैनल को तुरंत फॉलो करें।

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