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20 Feb
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रिजका की खेती से नहीं होगी हरे चारे की कमी | Rijka(Alfalfa) Cultivation: Ensure Abundant Green Fodder Supply

रिजका की खेती से नहीं होगी हरे चारे की कमी | Rijka(Alfalfa) Cultivation: Ensure Abundant Green Fodder Supply

रिजका की खेती से नहीं होगी हरे चारे की कमी | Rijka(Alfalfa) Cultivation: Ensure Abundant Green Fodder Supply

हमारे देश में हरे चारे में ज्वार और बरसीम के बाद रिजका की खेती प्रमुखता से की जाती है। भारत में रिजका की खेती करीब 1 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है। यह एक पौष्टिक चारा वाली फसल है। इसके सेवन से पशुओं की पाचन क्षमता बेहतर होने के साथ दूध उत्पादन की क्षमता भी बढ़ती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि 1 बार फसल की बुवाई करके किसान किसान कई वर्षों तक हरा चारा प्राप्त कर सकते हैं। आज इस पोस्ट के माध्यम से हम रिजका की खेती से होने वाले लाभ एवं इसकी खेती से जुड़ी अन्य बरियों की जानकारी प्राप्त करेंगे।

रिजका की खेती से होने वाले लाभ | Benefits of Rijka farming

  • रिजका एक दलहनी फसल है। इसकी खेती से खेत की मिट्टी में सुधार होता है और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है।
  • रिजका के पौधों की जड़ें गहरी होती हैं। जिससे पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है।
  • हरे चारे वाली अन्य फसलों की तुलना में रिजका की फसल में सिंचाई की आवश्यकता कम होती है।
  • वर्षा के मौसम को छोड़ कर वर्ष भर इसकी कटाई की जा सकती है।
  • एक बार फसल की बुवाई कर के 3 से 5 वर्षों तक इसकी कटाई की जा सकती है।
  • इसके सेवन से पशुओं की दूध उत्पादन क्षमता बढ़ती है।
  • रिजका में 18-25 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन और 25-35 प्रतिशत क्रूड फाइबर की मात्रा पाई जाती है।
  • गाय, भैंस, के अलावा मुर्गी पालन एवं सूअर पालन में भी रिजका को आहार के तौर पर शामिल किया जाता है।
  • कई पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण इसका सेवन पशुओं के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है।
  • मीठा और स्वादिष्ट होने के कारण पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं।
  • इसका उपयोग हरे चारे और सूखे चारे दोनों रूप में किया जाता है।
  • ये फसल ठंड, गर्मी एवं वर्षा सभी मौसम के प्रति सहनशील है।
  • दलहनी फसल होने के कारण रिजका की फसल में नाइट्रोजन की आवश्यकता कम होती है।

रिजका की खेती कैसे करें? | How to cultivate Rijka

  • उपयुक्त मिट्टी एवं बुवाई का समय: इसकी खेती के लिए गहरी एवं दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त है। क्षारीय मिट्टी एवं जल जमाव वाले क्षेत्रों में इसकी खेती न करें। इसके अलावा अम्लीय मिट्टी में भी इसकी उपज अच्छी नहीं होती है। इसकी बुवाई के लिए अक्टूबर-नवंबर का महीना सबसे उपयुक्त है।
  • बीज की मात्रा एवं बीज उपचार: प्रति एकड़ खेत में 4-5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। यदि किसी खेत में पहली बार रिजका की बुवाई कर रहे हैं तो बीज उपचारित करना आवश्यक है। इसके विकास के लिए एक विशेष प्रकार के जीवाणु की आवश्यकता होती है। इन जीवाणुओं का टीका आप स्थानीय किसान सेवा करंदर या चौधरी चरण सींग कृषि विश्वविद्यालय के माइक्रोबायोलॉजी विभाग से प्राप्त कर सकते हैं। इसके बाद 500 मिलीलीटर पानी में 100 ग्राम गुड़ मिला कर घोल तैयार करें। इस घोल में टीके का 1 पैकेट मिलाएं और 4-5 किलोग्राम बीज के ऊपर इस मिश्रण को लेप की तरह लगा कर बीज उपचारित करें। उपचारित बीज को छांव में सूखाएं।
  • खेत की तैयारी: खेत तैयार करते समय सबसे पहले 2 से 3 बार हल या कल्टीवेटर के द्वारा गहरी जुताई करें। इसके बाद रोटावेटर के द्वारा खेत को समतल बनाएं। खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ खेत में 22 किलोग्राम यूरिया, 250 सिंगल सुपर फॉस्फेट को बेसल डोज के तौर पर इस्तेमाल करें।
  • बुवाई की विधि: रिजका के बीज कठोर होते हैं। इसलिए बुवाई से पहले 6 से 8 घंटों तक बीज को पानी में भींगो कर रखें। इसके बाद हल्का सूखा कर बुवाई करें। इसकी बुवाई 11-12 इंच की दूरी पर कतारों में करें। इससे फसल की कटाई में आसानी होगी।
  • उर्वरक प्रबंधन: हर वर्ष प्रति एकड़ खेत में 50 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद के साथ 312 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट का प्रयोग करें।
  • सिंचाई प्रबंधन: बीज की बुवाई के करीब 1 महीने बाद पहली सिंचाई करें। इसके बाद गर्मी के मौसम में 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। ठंड के मौसम में 20-25 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। वसंत के मौसम में 15 से 20 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जाती है। वहीं वर्षा के मौसम में (वर्षा होने पर) फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है।
  • रोग एवं कीट प्रबंधन: अन्य फसलों की तरह रिजका की फसल में भी कई तरह के रोग एवं कीटों का प्रकोप होता है। जिनमें मृदुरोमिल आसिता रोग (डाउनी मिल्ड्यू), रतुआ रोग, लीफ स्पॉट रोग, रिजका वीविल और मोयला कीट प्रमुख हैं।
  • फसल की कटाई एवं पैदावार: बुवाई के 50-60 दिनों बाद फसल की पहली कटाई की जा सकती है। इसके बाद 30-40 दिनों के अंतराल पर फसल की कटाई की जा सकती है। प्रति वर्ष आप 8 से 10 बार फसल की कटाई कर सकते हैं। एक बार इसकी बुवाई कर के प्रति एकड़ खेत से हर वर्ष 250 से 300 क्विंटल हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है। वहीं प्रति एकड़ खेत से हर वर्ष करीब 55-60 क्विंटल तक सूखा चारा प्राप्त किया जा सकता है। बीज की बात करें तो प्रति एकड़ खेत से 180-250 किलोग्राम तक बीज प्राप्त किए जा सकते हैं।

हरा चारा प्राप्त करने के लिए आप किस फसल की खेती करते हैं? अपने जवाब हमें कमेंट के माध्यम से बताएं। पशुओं के आहार एवं उनके स्वास्थ्य से जुड़ी अधिक जानकारियों के लिए 'पशु ज्ञान' चैनल को तुरंत फॉलो करें। इसके साथ ही इस जानकारी को अधिक किसानों तक पहुंचाने के लिए इस पोस्ट को लाइक और शेयर करना न भूलें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न | Frequently Asked Question (FAQs)

Q: रिजका की खेती कब की जाती है?

A: रिजका की बुवाई अक्टूबर से दिसंबर के पहले सप्ताह तक की जा सकती है। लेकिन बहुवर्षीय फसल होने के कारण खेत में लगी फसल की कटाई, सिंचाई एवं उर्वरक प्रबंधन का कार्य आवश्यकता के अनुसार सभी मौसम में किया जाता है।

Q: किस हरे चारे में सबसे ज्यादा प्रोटीन होता है?

A: ग्लिरिसिडिया सेपियम की पत्तियों में अन्य चारे वाली फसलों की तुलना में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। इसमें करीब 25% से 30% क्रूड प्रोटीन होता है। यह भैंस, गाय जैसे जुगाली करने वाले पशुओं के लिए बहुत सुपाच्य होता है।

Q: गायों के लिए सबसे अच्छा चारा कौन सा है?

A: गाय के लिए हरे चारे के तौर पर नेपियर घास सबसे बेहतर होता है। इसमें 7 से 12 प्रतिशत तक प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है। इससे गायों की दूध उत्पादन क्षमता भी बढ़ती है है। इसके अलावा आप गाय के आहार में हरे चारे के तौर पर बरसीम, रिजका, ज्वार, अजोला, सूडान, जौ एवं जई, सरसों, मटर, ग्वार, लोबिया और मक्का भी शामिल कर सकते हैं।

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