पोस्ट विवरण
सुने
खरपतवार
सोयाबीन
खरपतवार जुगाड़
2 June
Follow

सोयाबीन की फसल में खरपतवार प्रबंधन (Weed Management in Soybean Crop)


सोयाबीन एक प्रमुख तिलहन फसल है, जिसमें प्रोटीन एवं विटामिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इससे किसानों को अच्छा मुनाफा होता है, लेकिन खरपतवार के कारण पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। खरपतवार की अधिकता से पौधों को उचित पोषक तत्व नहीं मिल पाते, और इससे 30 से 70 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। विभिन्न खरपतवार सोयाबीन की फसल को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं। ये पोषक तत्वों, पानी और धूप के लिए सोयाबीन के पौधों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे फसल की उपज और गुणवत्ता कम हो जाती है। इसलिए, सोयाबीन की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए खरपतवारों पर नियंत्रण करना बहुत जरूरी है।

सोयाबीन की फसल में खरपतवारों से होने वाले नुकसान | Impact of Weeds on Soybean Crop

  • अंकुरण में कठिनाई: सोयाबीन की फसल में खरपतवारों के कारण बीज के अंकुरण में कठिनाई होती है। खरपतवारों की समस्या बढ़ने पर कई बार बीज अंकुरित नहीं हो पाते हैं।
  • कमजोर पौधे: खरपतवार मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों को ग्रहण कर लेते हैं, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं।
  • बढ़वार में कमी: सोयाबीन की फसल में खरपतवारों के प्रकोप से फसल की बढ़वार धीमी हो जाती है।
  • उपज में कमी: सोयाबीन की फसल में खरपतवारों से होने वाले नुकसान के कारण इसकी पैदावार में 40 प्रतिशत तक कमी हो सकती है।
  • रोग और कीट प्रकोप: खरपतवार कई तरह के रोगों एवं कीटों के पनपने का कारण बनते हैं।
  • लागत में वृद्धि: खरपतवार नाशक का उपयोग करने पर कृषि में होने वाली लागत में बढ़ोतरी होती है। इसके साथ कीट एवं रोगों पर नियंत्रण के लिए भी विभिन्न दवाओं के प्रयोग से लागत बढ़ती है।
  • आर्थिक नुकसान: उपज एवं गुणवत्ता में कमी किसानों के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है।
  • पोषक तत्वों की कमी: खरपतवार भूमि में मौजूद आवश्यक पोषक तत्व एवं नमी का बड़ा हिस्सा अवशोषित कर लेती हैं, जिससे पौधों को उचित पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं।
  • प्रकाश और स्थान की कमी: खरपतवार आवश्यक प्रकाश एवं स्थान से फसल को वंचित कर देते हैं, जिससे पौधों के विकास में बाधा आती है।
  • रोग और कीट: खेत में विभिन्न घास के पनपने के कारण कई तरह के रोगों और कीटों के होने का खतरा बना रहता है।

सोयाबीन की फसल में खरपतवारों पर नियंत्रण के विभिन्न तरीके | Various methods of controlling weeds in soybean crop

  • फसल चक्र: विभिन्न फसलों को बदल-बदल कर उगाने से खरपतवारों के दबाव को कम किया जा सकता है।
  • इंटरक्रॉपिंग: सोयाबीन के साथ अन्य फसलों को मिलाकर उगाने से खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है।
  • समय पर रोपण: सही समय पर रोपण करने से सोयाबीन के पौधे खरपतवारों से पहले ही बढ़ जाते हैं, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है।
  • एकीकृत खरपतवार प्रबंधन: उपरोक्त विधियों में से दो या अधिक के संयोजन का उपयोग करके अधिक प्रभावी खरपतवार नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण को एकीकृत खरपतवार प्रबंधन कहा जाता है।
  • गहरी जुताई: खेत में पहले से मौजूद खरपतवारों को नष्ट करने के लिए 1-2 बार गहरी जुताई करना। इससे घास की जड़ें ऊपर आकर तेज धूप में नष्ट हो जाएंगी।
  • निराई-गुड़ाई: खेत में समय-समय पर हाथ से खरपतवारों को निकालना। पहली बुवाई के 20-25 दिनों बाद पहली निराई-गुड़ाई करें। दूसरी निराई-गुड़ाई बुवाई के 40-45 दिनों के बाद दूसरी बार निराई-गुड़ाई करें और खरपतवार को नष्ट करें।

रासायनिक तरीके:

  • इमेजेथापायर 10% एसएल (देहात ग्रासआउट): प्रति एकड़ खेत में 400-600 मिलीलीटर प्रयोग करें।
  • पेंडिमेथालिन 30% ईसी: बुवाई के 2-3 दिन के अंदर 1000-1500 मिलीलीटर पेंडिमेथालिन 30% ईसी का 100-200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
  • मेट्रिबुज़िन 70% WP: प्रति एकड़ 200-300 ग्राम मेट्रिबुज़िन 70% WP का छिड़काव करें।
  • क्यूजेलेफोप इथाइल 5% EC: 20-22 दिन के पौधों में 300-400 मिलीलीटर क्यूजेलेफोप इथाइल 5% EC का छिड़काव करें।
  • इमेजेथापायर 10% SC: प्रति एकड़ 400 मिलीलीटर इमेजेथापायर 10% SC का छिड़काव करें।
  • फिनोक्साप्रोप पी ईथाइल 9.3 EC: रोपाई के 15-20 दिनों बाद प्रति एकड़ 400 मिलीलीटर फिनोक्साप्रोप पी ईथाइल 9.3 EC का छिड़काव करें।

सोयाबीन में लगने वाले मुख्य खरपतवार (Major weeds in soybean)

  • चौड़ी पत्तियों वाले खरपतवार : इस तरह के घास की पत्तियां चौड़ी होती हैं। इसमें जंगली चौलाई, जंगली जूट, बन मकोय, कालादाना, हजारदाना, महकुंआ आदि शामिल हैं।
  • सकरी पत्तियों वाले खरपतवार : इस किस्म की घासों की पत्तियां पतली होती हैं। इसमें सांवक, कोदों, दूब आदि शामिल हैं।

खरपतवार नाशक दवाओं के छिड़काव के समय रखें इन बातों का ध्यान | Things to keep in mind while applying weedicides

  • एक ही खरपतवारनाशी का बार-बार प्रयोग न करें। बार-बार एक ही दवा इस्तेमाल करने से खरपतवार इसके प्रति सहनशील/प्रतिरोधी हो सकते हैं।
  • एक फसल में केवल एक बार रासायनिक खरपतवार नाशक का प्रयोग करना चाहिए।
  • खरपतवार नाशक दवाओं के पैकेट पर दिए गए निर्देशों को पढ़ें और उनका पालन करें।
  • खरपतवार नाशक दवा का प्रयोग करते समय, मिट्टी में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए, जिससे दवा सही तरीके से फसल तक पहुंच सके।
  • खरपतवार नाशक दवाओं का छिड़काव करते समय मात्रा का विशेष ध्यान रखें, इससे फसलों को किसी भी तरह के बुरे प्रभावों से बचा सकते हैं।
  • खरपतवार नाशक दवाओं में कई तरह के हानिकारक रसायन मौजूद होते हैं। इसलिए छिड़काव के समय आंख, नाक, मुंह, कान, आदि को अच्छी तरह ढकें।

आप सोयाबीन की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए क्या जुगाड़ करते हैं? अपना जवाब एवं अनुभव हमें कमेंट करके बताएं। इसी तरह की अन्य रोचक एवं महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए 'खरपतवार जुगाड़' चैनल को अभी फॉलो करें। अगर पोस्ट पसंद आयी तो इसे लाइक करके अपने किसान दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल | Frequently Asked Question (FAQs)

Q: खरपतवारनाशी का छिड़काव करते समय क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

A: खरपतवारनाशी में कई तरह के हानिकारक रसायन मौजूद होते हैं, जो मनुष्यों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर डालते हैं। इसलिए खरपतवारनाशी का छिड़काव करते समय अपने चेहरे को किसी कपड़े से अच्छी तरह ढकें। हाथों में भी दस्ताने पहन कर छिड़काव करें। दवाओं के छिड़काव के बाद हाथों को अच्छी तरह साफ करें। शाकनाशक के खाली पैकेट पशुओं के हानिकारक हो सकते हैं। इसलिए दवाओं के पैकेट को इधर-उधर न फेकें।

Q: खरपतवार नाशक का छिड़काव कब करना चाहिए?

A: खरपतवारों का छिड़काव सुबह या शाम के समय करना चाहिए। शाकनाशकों के छिड़काव के समय मिट्टी में उपयुक्त नमी होनी चाहिए। वर्षा होने की संभावना होने पर दवाओं का छिड़काव न करें।

Q: निराई कैसे की जाती है?

A: खेत में पनपने वाले खरपतवारों पर नियंत्रण के लिए निराई की जाती है। निराई के लिए खुरपी, कुदाल या हैरो का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में खरपतवारों को जड़ से उखाड़ कर या भूमि की ऊपरी सतह के पास से काट कर निकाला जाता है। इस प्रक्रिया में समय एवं श्रम की आवश्यकता अधिक होती है। इसलिए बड़े खेतों की तुलना में छोटे खेतों में इस विधि का प्रयोग अधिक किया जाता है।

34 Likes
Like
Comment
Share
फसल चिकित्सक से मुफ़्त सलाह पाएँ

फसल चिकित्सक से मुफ़्त सलाह पाएँ