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सोयाबीन: प्रमुख रोग, लक्षण, बचाव एवं नियंत्रण (Soybean: Major diseases, symptoms, prevention and control)


भारत सोयाबीन का प्रमुख उत्पादक देश है, और यह गर्म मौसम की फसल है। इसकी बुवाई जून से सितंबर में अच्छी तरह से सूखी दोमट मिट्टी में होती है। सोयाबीन की खेती में कई रोगों का सामना करना पड़ता है, जिनमें प्रमुख हैं पीला मोजेक, रतुआ, चारकोल रोट, कॉलर रॉट, पाउडरी मिल्ड्यू और पत्ती धब्बा। रोग प्रबंधन के लिए नियमित निगरानी और समय पर नियंत्रण आवश्यक है। इन रोगों के लक्षणों में पत्तियों पर धब्बे, पत्तियों का सिकुड़ना, तनों का काला पड़ना, और जड़ों का सड़ना शामिल हैं।

कैसे करें सोयाबीन में रोग नियंत्रण? (How to control diseases in soybean?)

पीला मोजेक रोग (Yellow Mosaic) :

  • पत्तियों पर पीले रंग के छोटे-छोटे धब्बे उभरना।
  • धब्बों का आकार धीरे-धीरे बढ़ना।
  • पत्तियां सिकुड़ना।
  • पौधों के विकास में बाधा आना।
  • फलों पर हल्के पीले रंग के धब्बे उभरना।
  • सभी पत्तों पर हल्के गहरे हरे रंग के दाग नजर आते है।
  • पत्ते ख़राब होकर नीचे की तरफ मूड जाते है।

रोग का नियंत्रण:

  • प्रभावित पौधों को नष्ट करें।
  • प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें।
  • प्रति लीटर पानी में 2-3 मिलीलीटर नीम का तेल मिलाकर छिड़काव करें।
  • प्रति लीटर पानी में 2 मिलीलीटर डाईमेथोएट 30 ई.सी. मिलाकर छिड़काव करें। आवश्यकता अनुसार 10 दिनों बाद दोबारा छिड़काव करें।
  • थियामेथोक्सम 12.6% & लैम्ब्डा-साइहलोथ्रिन 9.5% ZC दवा को 60 मिली प्रति एकड़ छिड़काव करें।
  • प्रति लीटर पानी में 1 मिलीलीटर इमिडाक्लोप्रिड 200 एस.एल. मिलाकर छिड़काव करें।

रतुआ/जंग (Rust Disease) :

  • पत्तियों की ऊपरी सतह पर छोटे, भूरे से लाल रंग के घाव।
  • घाव की तीव्रता बढ़ने पर पत्तियां पूरी तरह से खराब होकर गिर सकती हैं।
  • तने, डंठल और फलियों पर भी घाव होना।
  • फलियों के विकास में कमी और बीज की गुणवत्ता पर असर।
  • पत्तों पर लाल रंग के दाग नजर आते हैं और ये धब्बे धीरे धीरे फली और आदि जगहों पर भी दिखाई देते है।

रोग का नियंत्रण:

  • रतुआ रोग प्रतिरोधी किस्मों की खेती करें।
  • नियमित रूप से खेत की जांच करें।
  • फसल चक्र अपनाएं।
  • कटाई के बाद फसल के अवशेषों को हटाकर नष्ट करें।
  • मैंकोजेब 75% WP 2.5-3 ग्राम प्रति किलोग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर संक्रमित पौधों की जड़ों पर डालें।
  • प्रोपिनेब 70% WP (जिनेक्टो-देहात) 2 ग्राम प्रति लीटर पानी।
  • अझॉक्सीस्ट्रोबिन 18.2% + डिफेन्कोनाझोल 11.4% SC (सिम्पैक्ट-देहात) 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी।
  • अवतार हेक्साकोनाज़ोल 4% + ज़िनेब 68% WP दवा को 400 ग्राम प्रति एकड़ छिड़काव करें।
  • टेबुकोनाज़ोल 6.7% + कैप्टन 26.9% एससी दवा को 400 मिली प्रति एकड़ छिड़काव करें।

कॉलर रॉट (Collar Rot) :

  • पौधों का अचानक पीला पड़ना या मुरझाना।
  • तने पर हल्के भूरे रंग के घाव जो समय के साथ गहरे और बड़े होते रहते हैं।
  • पत्तियां भूरी होकर सूखना।

रोग का नियंत्रण:

  • रोग प्रतिरोधी फसलों का चयन करें।
  • मिट्टी की जल निकासी में सुधार करें।
  • अत्यधिक सिंचाई से बचें।
  • पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखें।
  • तने पर चोट या खरोंच से बचें।
  • गर्मियों में गहरी जुताई करें।
  • कार्बेन्डाजिम 25% + मैन्कोजेब 50% WS 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचार करें।
  • मैंकोजेब 75% WP दवा 400 ग्राम प्रति किलोग्राम घोल बनाकर संक्रमित पौधों पर छिड़काव करें।

पत्ती धब्बा (Leaf Spot Disease) :

  • पत्तियों पर छोटे, गोल, हल्के से गहरे भूरे रंग के धब्बे जो कत्थई रंग के घेरे से घिरे रहते हैं।
  • धब्बों का आपस में मिलकर अनियमित आकार का हो जाना।

रोग का नियंत्रण :

  • स्वच्छ व प्रमाणित बीजों का उपयोग करें।
  • 2 ग्राम थायरम + 1 ग्राम बाविस्टीन प्रति किलो बीज के हिसाब से बीज उपचार करें।
  • रोग दिखते ही कार्बेन्डाजिम या थायोफिनेट मिथाइल (0.05 से 0.1 प्रतिशत) घोल का छिड़काव करें।

शुष्क जड़ सड़न (Dry Root Rot ) :

  • निचली पत्तियों पर पीलापन होने लगता है और बाद में पत्तियां पीली पड़ कर मुरझा जाती हैं।
  • जिन हिस्सों पर इस रोग का संक्रमण देखा गया है उन प्रभावित ऊतकों का रंग आमतौर पर भूरा हो जाता है।
  • काले पाउडर जैसे स्क्लेरोटिया दिखाई देते हैं, जिससे इस बीमारी को चारकोल रोट भी कहा जाता है।
  • पौधे की जड़ों का काला पड़ जाना और और आसानी से टूट कर सूखना।
  • यह फफूंद शुष्क परिस्थितियों, कम मिट्टी की नमी और 25°C से 35°C तापमान में जीवित रहता है।

रोग का नियंत्रण :

  • ग्रीष्म ऋतु में गहरी जुताई करें ताकि मिट्टी में मौजूद रोगजनकों का नाश हो सके।
  • फसल का संतुलित उर्वरकीकरण सुनिश्चित करें ताकि पौधों को सभी आवश्यक पोषक तत्व मिलें।
  • खेत को अच्छी तरह से सूखा रखें ताकि जलभराव न हो।
  • पिछले वर्ष की संक्रमित पराली को नष्ट कर दें।
  • कार्बेन्डाजिम या थीरम से 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजों का उपचार करें।

चूर्णिल आसिता रोग (Powdery mildew disease) :

  • रोगग्रस्त पत्तियों में सफेद से लेकर हल्के भूरे, धब्बे होते हैं।
  • ये धब्बे एक पौधे में कई पत्तियों की सतहों पर बढ़ते हैं और उन्हें ढक लेते हैं।

रोग का नियंत्रण :

  • फसल में हवा के अच्छे आवागमन के लिए पौधों के बीच दूरी रखें। फसल को पानी देते समय फसल को भीगने से बचें।
  • मैंकोजेब 75% WP 2.5-3 ग्राम प्रति किलोग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर संक्रमित पौधों की जड़ों पर डालें।
  • टेबुकोनाज़ोल 6.7% + कैप्टन 26.9% एससी दवा को 400 मिली प्रति एकड़ छिड़काव करें।

रोगों के प्रबंधन के लिए सामान्य उपाय (General measures to manage diseases)

  • खेत की स्वच्छता बनाए रखें और फसल अवशेषों को नष्ट करें।
  • स्वच्छ और प्रमाणित बीजों का उपयोग करें तथा बीज उपचार करें।
  • फसल चक्र अपनाएं और एक ही फसल को लगातार न उगाएं।
  • खेत में अच्छी जल निकासी सुनिश्चित करें।
  • फसल की नियमित रूप से जांच करें और रोग के लक्षण दिखाई देने पर त्वरित उपाय करें।

क्या आप सोयाबीन की फसल में रोगों से परेशान हैं? अपना जवाब एवं अनुभव हमें कमेंट करके बताएं। इसी तरह की अन्य रोचक एवं महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए 'किसान डॉक्टर' चैनल को अभी फॉलो करें। और अगर पोस्ट पसंद आयी तो इसे लाइक करके अपने किसान मित्रों के साथ साझा करना न भूलें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल | Frequently Asked Questions (FAQs)

Q: सोयाबीन में कौन कौन सी बीमारी आती है?

A: सोयाबीन भारत में विभिन्न बीमारियों के लिए अतिसंवेदनशील है, जिसमें सोयाबीन रस्ट, बैक्टीरियल प्यूस्ट्यूल, एन्थ्रेक्नोज, स्टेम कैंकर और चारकोल रॉट शामिल हैं। अगर ठीक से प्रबंधित नहीं किया गया तो ये रोग महत्वपूर्ण उपज हानि का कारण बन सकते हैं।

Q: सोयाबीन के प्रमुख कीट कौन-कौन से हैं?

A: भारत में सोयाबीन के प्रमुख कीटों में स्टेम बोरर, सेमी-लूपर, लीफ फोल्डर, पॉड बोरर, व्हाइटफ्लाई, जैसिड, माइट् और थ्रिप्स शामिल हैं। ये कीट सोयाबीन फसलों को महत्वपूर्ण नुकसान पहुंचा सकते हैं और फसल की उपज में भी भारी कमी होती है।

Q: सोयाबीन की खेती कब करें ?

A: सोयाबीन की खेती मुख्य रूप से खरीफ के मौसम में जून से जुलाई के महीने में करते हैं। खेती का सही समय स्थान और जलवायु परिस्थितियों के आधार पर भिन्न होता है। अच्छी वृद्धि और उपज के लिए सोयाबीन के बीज बोने का सही समय तब होता है जब मिट्टी का तापमान लगभग 25-30 डिग्री सेल्सियस होता है और मिट्टी में पर्याप्त नमी होती है।

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