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29 Feb
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जीरो बजट प्राकृतिक खेती: लाभ एवं प्रक्रिया | Zero Budget Natural Farming: Benefits and Process

जीरो बजट प्राकृतिक खेती: लाभ एवं प्रक्रिया | Zero Budget Natural Farming: Benefits and Process

कई लोगों में एक सामान्य धारणा बनी हुई है कि फसलों को उगाने में काफी खर्च होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (शून्य बजट प्राकृतिक खेती) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बहुत कम खर्च या बिना खर्च के भी कृषि करना संभव है। इसके साथ ही इन दिनों लोग स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्राकृतिक और स्वदेशी खाद्य पदार्थों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। ऐसे में जीरो बजट प्राकृतिक खेती एक बेहतरीन पहल है। आज के इस पोस्ट में हम जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग के लाभ और इसकी प्रक्रिया पर विस्तार से जानकारी प्राप्त करेंगे।

क्या है जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (जेडबीएनएफ)? | What is Zero Budget Natural Farming (ZBNF)?

जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग एक ऐसी खेती पद्धति है जिसमें किसान बिना किसी रासायनिक खाद या कीटनाशकों का प्रयोग किए, केवल प्राकृतिक तत्वों का उपयोग करके खेती करता है। इस पद्धति में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर प्राकृतिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। शून्य बजट प्राकृतिक खेती में इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक उर्वरकों को किसान खुद ही तैयार कर सकते हैं।

जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग के लाभ | Benefits of Zero Budget Natural Farming

  • लागत में कमी: जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। ऐसे में इन पर होने वाले खर्च में कमी आती है। किसान अपनी खेतों को पोषित करने के लिए स्थानीय और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग कर सकता है, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
  • जल संरक्षण: प्राकृतिक तरीके से खेती करने से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है। सेंटर फार स्टडी आफ साइंस, टेक्नोलाजी एंड पालिसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्राकृतिक खेती में पानी और बिजली की आवश्यकता 50 से 60 प्रतिशत तक कम होती है। इस पद्धति को अपनाकर भूजल की समस्या में सुधार हो सकता है।
  • उर्वरक क्षमता: प्राकृतिक विधि से खेती करने पर मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है। गाय के गोबर, गौमूत्र आदि से तैयार किया गया खाद मिट्टी को अधिक उपजाऊ बनाने में सहायक है।
  • स्वास्थ्य लाभ: घर पर तैयार किए गए खाद एवं कीटनाशकों के प्रयोग से हानिकारक रसायनों के इस्तेमाल में कमी आती है। प्राकृतिक तत्वों के कारण उत्पन्न होने वाले खाद्य पदार्थ अधिक पौष्टिक होते हैं।
  • बायो-विविधता का समर्थन: जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग में बायो-विविधता को समर्थन करने का कारण होता है। यह नकरात्मक प्रभावों से बचने में मदद करता है और वन्यजीवों के लिए सुरक्षित और स्वास्थ्यपूर्ण माहौल बनाए रखता है।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती की प्रक्रिया | Process of Zero Budget Natural Farming

  • बीज का चयन एवं उपचार: जीरो बजट प्राकृतिक खेती में सही बीज का चयन करना महत्वपूर्ण है। बुवाई के लिए रोग मुक्त बीज का चयन करें। बीज को किसी तरह के रासायनिक कीटनाशक एवं फफूंद नाशक से उपचारित न करें। बीज के उपचार के लिए बीजामृत का प्रयोग करें।
  • उर्वरक: प्राकृतिक खेती में उर्वरक के रूप में गौमूत्र, गाय के गोबर या खाद्य पदार्थों से घर में तैयार किए गए उर्वरकों का प्रयोग करें। ये फसल की उत्पादकता एवं पौष्टिकता को बढ़ाने में सक्षम हैं।
  • रोग एवं कीट प्रबंधन: प्राकृतिक खेती में कीटनाशकों की बजाय प्राकृतिक तरीकों से रोग और कीट प्रबंधन करना होता है। फसलों को रोग एवं कीटों से बचाने के लिए जीवामृत का प्रयोग करें।
  • मल्चिंग: मिट्टी में नमी की मात्रा को बनाए रखने के लिए मल्चिंग करें। मल्चिंग करने से खेत में खरपतवारों की समस्या में भी कमी आती है। इससे मिट्टी की ऊपरी सतह भी सुरक्षित रहती है।
  • फसल की देखभाल: फसल की सही देखभाल के लिए किसान को नियमित रूप से खेतों की निगरानी करनी चाहिए। इससे फसल को हानि पहुंचाने वाले रोग एवं कीटों से बचाव करने में आसानी होती है।

शून्य बजट प्राकृतिक कृषि के सिद्धांत | Principles of Zero Budget Natural Farming

  • बीजामृत: इसे देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र के से तैयार किया जाता है। शून्य बजट प्राकृतिक खेती का यह प्रथम चरण है। इससे बीज का उपचार किया जाता है।
  • जीवामृत: गाय के गोबर व गोमूत्र से तैयार किया जाता है। इसे मिट्टी में डालने से उर्वर क्षमता बढ़ती है और मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव व केंचुए आदि सक्रिय होते हैं। इसके साथ ही यह एक बेहतर कीटनाशक भी है।
  • आच्छादन (मल्चिंग): खेत को फसली अवशेष या अन्य कार्बनिक कचरे से ढंक दिया जाता है। समय के साथ ये अवशेष सड़-गल जाते हैं और खेत की ऊपरी परत को ढंकने वाली एक तह बन जाती है। इससे जमीन की उर्वर क्षमता भी बढ़ती है और खर-पतवार भी कम निकलते हैं।
  • व्हापासा (भाप): जीरो बजट प्राकृतिक खेती में पौधों की ग्रोथ के लिए अधिक जल की आवश्यकता नहीं होती है और पौधे व्हापासा यानी भाप की सहायता से बढ़ सकते हैं। इससे अच्छी बारिश नहीं होने की स्थिति में भी बेहतर फसल पाना संभव होता है।

जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग पद्धति से खेती की है? अपने जवाब एवं अनुभव हमें कमेंट के माध्यम से बताएं। इस तरह की अधिक जानकारियों के लिए 'कृषि टेक' चैनल को तुरंत फॉलो करें। इसके साथ ही इस पोस्ट को लाइक और शेयर करना न भूलें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न | Frequently Asked Question (FAQs)

Q: जीरो बजट प्राकृतिक खेती की शुरुआत किसने की?

A: जीरो बजट प्राकृतिक खेती महाराष्ट्र के कृषि विशेषज्ञ एवं किसान सुभाष पालेकर द्वारा विकसित की गई है। सुभाष पालेकर जी को पद्म श्री से पुरस्कृत किया गया है। पालेकर जी नें 60 से अधिक भाषाओं में जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग पर किताबें लिखी हैं।

Q: भारत के किन राज्यों में जीरो बजट प्राकृतिक खेती पद्धति को अपनाया जाता है?

A: भारत में कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, केरल एवं आंध्र प्रदेश में बड़े पैमाने पर जीरो बजट प्राकृतिक खेती को अपनाया जाता है। इसके अलावा कई अन्य राज्यों में भी इस पद्धति से खेती की जाने लगी है।

Q: क्यों जीरो बजट प्राकृतिक खेती रासायनिक खेती से बेहतर है?

A: जीरो बजट प्राकृतिक खेती से मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है, सिंचाई के समय पानी की आवश्यकता कम होती है, उपज अच्छी होती है, पौष्टिक एवं उच्च गुणवत्ता के फसल प्राप्त होते हैं, कृषि में लागत नहीं होने के कारण किसानों को अधिक मुनाफा होता है, हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल नहीं होने से स्वास्थ्य लाभ होता है। इसके अलावा प्राकृतिक खेती के कई अन्य फायदे भी हैं जो इसे रासायनिक खेती से बेहतर बनता है।

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